रामगंज की घटना महज इत्तेफाक या साजिश

जयपुर। गंगा-जमुनी तहजीब के लिए देश -दुनिया में अपनी एक विशेष पहचान रखने वाली गुलाबी नगरी में शुक्रवार की रात हिंसा-आगजनी, तोडफ़ोड़ और उपद्रव का दंगाई भीड़ ने जो नंगा नाच किया उसने शहर की शांतिपूर्ण फिजां में न केवल जहर घोला अपितु सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन इस घटना में जिस महिला को पुलिसकर्मी के डंड़ा मारने से विवाद के तूल पकडऩे की वजह बताया जा रहा था उसके बयान ने उपद्रव के आकस्मिक होने की बजाए किसी सोची-समझी साजिश के तहत समाजकंटकों के परकोटे के इस घनी आबादी क्षेत्र को एक बड़ी हिंसा में झोंकने का संकेत किया है।

अर्थात् यह उन फितरतियों की कारगुजारी थी जो जयपुर की शांति, प्रेम, सद्भावना और आपसी भाइचारे की भावना से इत्तेफाक नहीं रखते। लेकिन सबसे शर्मनाक कुछ चुनिंदा अपराधीतत्वों के साथ समुदाय विशेष के लोगों का भीड़ का हिस्सा बनकर वाहनों में तोडफ़ोड़ करना, एंबुलेंस, बिजली पावर हाउस में आग लगाना और घटना की कवरेज करने गए मीडियाकर्मियों से मारपीट कर उनके कैमरे तोड़ देना जैसी घृणित और शर्मनाक हरकतें करना है।

आखिरकार जब पुलिसकर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट तक दर्ज करने की बात उच्चाधिकारियों द्वारा स्वीकार की जा चुकी थी तो फिर ये बेबात का बतंगड़ क्यों खड़ा किया गया! पिछले 48 घंटों से जब चार थाना इलाकों की आबादी कफ्र्यू, इंटरनेट सेवाओं पर रोक झेल रही हो तो बहुत बड़े वर्ग की परेशानियों को महसूस किया जा सकता है।

भूख से व्याकुल रोते-बिलखते बच्चों को दूध-खाना नसीब नहीं होना, बीमार रोगियों को समय पर दवा नहीं मिलना और रंभाते पशु-मवेशियों का चारा नहीं मिलना, राशन सामग्री और सब्जी के लिए लोगों का मारे-मारे फिरने के लिए आखिर किसे जिम्मेदार माना जाए! क्या इतनी परेशानियां झेलने के बाद भी हमें उन दंगाइयों को संबल देना चाहिए जो लाखों की संख्या में लोगों को उनके घरों में कैद करवाने के लिए जिम्मेदार हैं।

साथ ही इस बात से जयपुर के पुराने वाशिंदे इनकार नहीं कर सकते हैं कि पुश्तों से यहां रहते आ रहे हिंदू-मुसलमानों के आपसी रिश्ते जो मजबूती से गूंथे हुए हैं उनमें भी गांठ डालने की कई बार शरारती तत्व कोशिशें करते हैं लेकिन पंच पटेलों की समझदारी से आपसी विवाद का हल निकालकर जयपुर को आगे बढ़ाने में दोनों ही तरफ से सकारात्मक पहल होती रही है।

अत: इस विवाद का पटाक्षेप करने के लिए भी मुस्लिम समाज के पंच-पटेतों को अपनी भूमिका निभाने के लिए बेझिझक आगे आना चाहिए। चूंकि किसी भी अपराधी की कोई जाति-धर्म या ईमान नहीं होता ऐसे में इस घटना में जिस किसी की भूमिका है उन्हें पहल करते हुए कानून के दायरे में लाना चाहिए।

इस दुखद घटना में हताहत हुए युवक की मौत पर संताप के बजाए सियासत करने वाले न तो मृतक के परिजनों के शुभचिंतक हो सकते हैं और न ही उन्हें सभ्य समाज का अंग कहा जा सकता है।

संपूर्ण घटना की न्यायिक जांच पर पुलिस प्रशासन तैयार है तो उस पर ऐतबार किया जाना चाहिए, लेकिन सबसे पहली कोशिश मृतक का पोस्टमार्टम करवाकर उसे इज्जत से सुपुर्द-ए-खाक किए जाने की होनी चाहिए।

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