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कॉरपोरेट घराने हाथ बढ़ाएं तो सुधरे खेलों की स्थिति : देवेंद्र

 जयपुर। (वैभव शर्मा) अगर इंसान में जज्बा हो तो असंभव को संभव किया जा सकता है। जैसे दशरथ मांझी ने अपने जज्बे को कायम रखते हुए असंभव काम को संभव किया था ठीक ऐसे ही जज्बे के साथ खेल रत्न देवेंद्र झाझडिय़ा ने राजस्थान ही नहीं देश को गौरव और सम्मान दिलाया है। वे अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि मैं महज 8 साल का था, खेलते हुए अचानक करंट लगा और मेरे एक हाथ ने काम करना बंद कर दिया।

ऐसे में मुझे लगा कि अब मैं बेहद मुश्किल परिस्थिति में हूं और शायद ही आगे भविष्य में सामान्य इंसानों की तरह जीवन जी पाऊंगा। उसी दौरान अस्पताल में डॉक्टर ने मेरा हाथ ठीक नहीं हो पाने के कारण उसे काट दिया। ऐसे में मेरे दिमाग में कई सवाल थे जिनसे मैं खुद ही लड़ता और जीता रहा। सोचता था क्या सामान्य लोग मुझे ऐसे स्वीकार करेंगे।

क्या मेरे साथ के सहपाठी और मित्र मेरे साथ खेलेंगे। इन्हीं सवालों के जवाब जाने बिना मैंने स्वयं को एक कमरे तक सीमित कर लिया। ऐसे में उस अंधकार में मेरी माताजी ने मुझे रोशनी दिखाई। उनकी बात मुझे याद है जब उन्होंने मुझे ऐसे देख कर कहा था कि बेटा हार मत मान, बाहर जा और अपने दोस्तों के साथ खेल। बस वहीं से मेरे खेल की शुरुआत हुई। मैंने लोगों के बीच जाकर उनके साथ खेलना शुरू किया और अपनी झिझक मिटाई।

लेकिन समस्या यहां से आगे और भी थी। जब मैंने स्कूल में खेल को अपने जीवन का हिस्सा बनाने की सोची तो वहां भी मुझे कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। ग्राउंड पर कोच और अन्य खिलाड़ी देखते और कहते थे कि तुम कैसे खेल पाओगे, तुम्हारे से नहीं हो पाएगा।

मुझे कहा जाता था कि तुम तो पढ़ाई में ध्यान लगाओ स्पोट्र्स तुम्हारे बस का नहीं है। लेकिन मैंने उस स्थिति को भी सहन करते हुए आज खिलाड़ी के रूप में अपने 22 साल के करियर को कंप्लीट किया। ऐसे रोमांचकारी अनुभव के साथ खेल रत्न देवेंद्र झाझडिय़ा ने महानगर कार्यालय में शिरकत की और अपने अनुभवों से रूबरू करवाया।

कॉलेज से हुई शुरुआत
मेरी जेवेलिन थ्रो की सही मायने में कॉलेज से शुरुआत हुई। मैंने वहीं से सोच लिया था कि मुझे इंडिया के लिए खेलना है और देश का नाम पैरालंपिक में आगे बढ़ाना है। मेरे दिमाग में ऐसा नहीं था कि सिर्फ नौकरी के लिए मुझे स्पोर्ट से जुडऩा है। अपने जज्बे को कायम रखते हुए मैंने इसी ओर बढऩा जारी रखा। मैंने 1995- 96 से शुरुआत की। 2004 में वल्र्ड रिकॉर्ड बनाया। जिसके बाद आज 22 साल के करियर में कई उतार-चढ़ाव देखते हुए खेल रत्न पाया जिसकी ख़ुशी मुझे हमेशा है।

पत्नी मंजू ने किया मोटीवेट
मेरी माताजी ने जहां मेरे करियर की शुरुआत में मुझे मेरी ताकत और हुनर से रूबरू करवाया वहीं करियर के बीच रास्ते में मुझे मेरी पत्नी मंजू ने बेहद सपोर्ट किया। 2010 के दौरान एक अहम् टूर्नामेंट में मेरा चयन नहीं हो पाने से मैं बेहद निराश हो गया था। मैंने फैसला किया कि मैं अपनी पत्नी मंजू जो नेशनल कबड्डी प्लेयर हैं उनका सपोर्ट करूंगा और उन्हें ही प्रमोट करूंगा। जब मैंने यह बात उन्हें बताई तो उन्होंने तुरंत मुझे मोटीवेट करते हुए एक सच्चे खिलाड़ी की तरह फिर से जोश के समंदर में गोता लगाने को मजबूर कर दिया। और हुआ भी वहीं मैंने उसके बाद 2 गोल्ड जीते। कुल मिलाकर मैंने अपने देश के लिए 3 गोल्ड लिए।

खेलों में भ्रष्टाचार पर बोले झाझडिय़ा
झाझडिय़ा ने खेलों में कथित पक्षपात और भ्रष्टाचार को लेकर अपनी बेबाक राय रखते हुए कहा कि अगर खेलों में भ्रष्टाचार होता तो शायद ही ये किसान का बेटा कभी इतना बड़ा खिलाड़ी बन पाता। इन सब अफवाहों से परे रहते हुए युवा खिलाड़ी सिर्फ अपने खेल पर ध्यान दें। टेलेंट देर से ही सही लेकिन नजरों में जरूर आएगा। क्योंकि यही एक ऐसी चीज है जो कोई भी आपसे नहीं छीन सकता।

तो ये हैं सेहत का राज
कहीं भी चले जाइए दुनिया घूम आइए, अच्छे से अच्छा खाना खा लीजिए। डाइटीशियन भी रख लीजिए लेकिन मां के हाथ का बना खाना कहीं नहीं मिल पाएगा। मुझे बाजरे की रोटियां बेहद पसंद हैं जब मां उन्हें हाथों से बनाती हैं। वैसे तो मैं डाइट को लेकर सजग रहता हूं लेकिन जब बात मां के हाथ की बाजरे की रोटी की हो तो वहां मैं अपनी डाइट से कंप्रोमाइज कर ही लेता हूं।

खेलों को समझें युवा
स्पोट्र्स को लेकर अपनी अलग राय रखने वाले और इसे करियर में अहमियत ना देने वाले युवाओं को लेकर झाझडिय़ा ने कहा कि देखिए, खेलों को आजकल युवा टाइम पास की तरह लेते हैं। वे इसे गंभीरता से लें तो यह एक ऐसा रामबाण है जो जीवन में मुफ्त मिलता है। खेलों के मायने सिर्फ ओलंपिक से नहीं है बल्कि ये तो आज की भागदौड़ भरी लाइफ में सबसे अच्छा व्यायाम है और इसी व्यायाम से जब किसी एक व्यायाम में आप निपुण हो जाओ तो उसको लेकर जी जान लगा दीजिए सफलता आपके कदम जरूर चूमेंगी। बशर्ते अपने अंदर की आग, जुनून और जोश को कभी कम मत होने दीजिएगा। युवाओं में एक चिंगारी जलती रहनी हमेशा जरूरी है ताकि खेलों से लेकर देश और देश के भविष्य में बदलाव आ सके।

अब खेलों में दांव लगाएं कॉरपोरेट घराने
देखिए, सरकार अकेले इतने सारे स्पोट्र्स का मेंटिनेंस खुद नहीं उठा पाती है। हर सिक्के के दो पहलुओं की तरह अब सरकार के साथ कॉरपोरेट घरानों को भी खेलों में अपनी रुचि दिखानी होगी। जिस तरह क्रिकेट को एक्सपोजर मिल रहा है ठीक उसी तरह पैरालंपिक समेत ओलंपिक के कई खेलों में अगर सरकार के साथ कॉरपोरेट से जुड़े बड़े घराने मिल कर काम करें तो भारत के गोल्ड मैडल की संख्या बढ़ सकती है। यही सत्य है, आज क्रिकेट को देखिए कितना अच्छा कर रही है हमारी टीम। ठीक ऐसे ही अगर एथलेटिक्स पर भी ध्यान दिया जाए तो मेरा मानना है भारत का ओलंपिक में स्वर्णिम प्रदर्शन होगा।

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