• Thursday , 23 February 2017
Breaking News

230 साल पहले तुंगा में मराठाओं के आक्रमण के विरोध में हुआ था महासमर : आज भी खेतों से मिल रहे हैं यौद्धाओं के अवशेष

Advertisment

Advertisment

जयपुर। (संजय चंद्रवाल) इतिहास के पन्नो में सिमटा हुआ तुंगा युद्ध जो तुंगा कस्बे की रण भूमि पर कदम रखते ही महसूस होता है। हम बात कर रहे है राजधानी जयपुर से जुड़े तूंगा कस्बे की जहा 230 साल पहले 28 जुलाई, 1787 को सवाई प्रतापसिंह व जोधपुर महाराजा विजयसिंह की संयुक्त सेना और मराठाओ के बीच चौथवसूली के कारण हुआ था।

तूंगा में हुए युद्ध में बिजली की तरह चली तलवारों और तोपों से आग उगलते छूटे 14 सेर के गोलों से अनेक हाथी, घोड़े व महावत भी नहीं बचे थे। आज भी मृत सैनिकों की हड्डियां माधोगढ़ और तूंगा के खेतों में निकल आती हैं।

यह है तूंगा युद्ध की पूरी कहानी
दिल्ली के बादशाह शाह आलम ने मराठा महादजी सिंधिया को सर्वेसर्वा बना दिया था। मुगलों की ताकत मिलने के बाद सिंधिया ने राजपूताना की रियासतों में तोप व तलवार के बल पर चौथ वसूली और लूटपाट करनी शुरु कर दी थी।

सिंधिया ने जयपुर महाराजा प्रताप सिंह से 240 करोड़ रुपए मांगे थे। महाराजा के प्रधानमंत्री दौलतराम हल्दिया ने मराठों से बातचीत कर 60 लाख रुपए देने का करार किया। मराठों को समय पर रकम नहीं मिली तब सिंधिया ने फ्रांसिसी डिबॉयन को कमांडर बनाकर जयपुर पर चढ़ाई कर दी।

इस संकट की घड़ी में प्रतापसिंह को जोधपुर की पच्चीस हजार की सेना का सहारा मिला, जिस कारण जयपुर की फौज ने मराठों के दांत खट्टे कर दिए। इस युद्ध में जोधपुर के राजा ने जयपुर की रक्षा करने के लिए ही 25 हजार घुड़सवारों की सेना भेजी थी। जयपुर और जोधपुर दोनों ही सेनाओं की संयुक्त कमान सोजत के एक ओसवाल जैन फौज बख्शी भीमसिंह सिंघवी के हाथों में थी।

तोपों ने 5 से 14 सेर के गोले बरसा कर तूंगा के मैदान को कम्पायमान कर दिया। मराठा सेनाओं के पास फ्रांस के गोला बारूद वाले थे, जबकि सामरिक दृष्टि से जयपुर और जोधपुर की सेना कमजोर पड़ रही थी।

लेकिन सेनापति भीमसिंह सिंघवी ने प्रतापसिंह को भरोसा दिया था कि वह 12 घण्टों में मराठों को हरा देंगे और उन्होंने यह कर दिखाया। भीमसिंह सिंघवी के शौर्य और जोधपुर की सामरिक मदद की प्रतापसिंह ने पूरी प्रशंसा की।

लेकिन 1787 में तूंगा युद्ध में बुरी तरह पिटने के बाद भी मराठे मान नहीं रहे थे और बराबर जयपुर पर उनकी नजरें रहती थी। मराठा सेना जयपुर के दक्षिण-पूर्व में लालसोट पहुंच गई, जहां प्रतापसिंह की सेना ने एक बार फिर मराठों को हराया। लेकिन लुटेरे मराठे दो बार हारने के बाद पूरी तैयारी से लड़ने के लिए पाटन पहुंच गए, जो नीम का थाना के पास है। ठा. प्रहलाद सिंह के अनुसार पहले तो मराठों के हमले से जयपुर के पैर उखड़ गए।

लेकिन स्थानीय तोमरों की मदद से जयपुर ने मराठों को आखिर भगा दिया। तोमरों की सही समय पर दी गई सेवाओं को उपकार मानकर प्रतापसिंह ने एक सुन्दर-सुशील तोमर कन्या से विवाह भी किया। लेकिन ग्वालियर के महादजी सिन्धिया, जो बहुत ही बहादुर माने जाते थे, प्रतापसिंह की नींद हराम कर रहे थे। भारी रकम बतौर चौथ वसूलना उनका काम था।

अपनी सेना लेकर 1791 में वह साम्भर पहुंच गए और अपने सवारों के हाथ प्रतापसिंह को सन्देश भेजा कि वह चौथ भिजवा दे। प्रतापसिंह की हिम्मत देखकर जोधपुर भी जयपुर के साथ हो लिया और दोनों ने मिलकर महादजी की मराठा सेना का मुकाबला करने का फैसला किया। यह संयुक्त अभियान देखते हुए महादजी घबराए और सन्धि के लिए राजी हो गए।

सन्धि कर वह अजमेर पहुंच गए और वहां पुराने शहर पर कब्जा कर लिया। 1793 में महादजी सिन्धिया की मृत्यु के बाद प्रतापसिंह ने पुरानी सन्धि तोड़ दी। इसके बाद मराठों से पुरानी दुश्मनी पुनः पनपी। होल्कर ने पुनः चौथ मांगनी शुरू की और जयपुर राज्य की भूमि का बड़ा हिस्सा हड़पने की नीयत से जयपुर से 100 किलोमीटर दूर मालपुरा पहुंच गया।

मराठों की सेना 16 हजार थी, प्रतापसिंह ने 27 हजार की सेना झोंक दी। पण्डित कृष्ण दत्त ने लिखा है कि मराठों को लड़ाई में हराने के बाद उनके घोड़े और असलहे पर प्रतापसिंह का कब्जा हो गया।

मालपुरा में जीतने के बाद प्रतापसिंह का जयपुर लौटने पर अद्भुत स्वागत हुआ। लेकिन उनके विश्वस्त दौलतराम हल्दिया और कुशालीराम बोहरा ने यह भी प्रतापसिंह को बता दिया कि लगातार लड़ाइयों से राज्य का खजाना खाली हो गया है। आखिरकार प्रतापसिंह ने मराठों को ले-देकर युद्ध बन्द कराया।


 

Advertisment

Related Posts

Leave A Comment