• Thursday , 23 February 2017
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किससे करें गुहार: कच्चे मकानों के सरकार मांग रही दस्तावेज

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जयपुर। (योगेश भावरा) गंदे नाले के पास गंदगी का आलम, छोटे छोटे कच्चे घर। घरों के आगे फैली कचरे की थैलियां, दो तीन छोटे प्लास्टिक के बर्तनों में पीने का पानी, अधजले चूल्हे। बमुश्किल छुुटपुट काम करने जिंदगी का जुगाड़ करते लोगों के पास कोई स्थाई रोजगार नहीं है।

ऐसे में गरीबी में पलते अधपटे कपड़ों में खेलते बच्चों के आशियाने उजडऩे का डर है जो हरिजन बस्ती के गरीब लोगों की आंखों से नींद उड़ाए हुए है। बैचेनी में उनकी रातों की नींद और दिन का चैन ही हवा हो गया है।

मालवीयनगर की हरिजन बस्ती में रह रहे 1 गुणा 8 घरों के लोगों में से 102 को जयसिंहपुरा खोर में बन रहे मकानों में स्थानांतरित करने की योजना है। इनमें से आधों को जलमहल से आगे जयसिंहपुरा खोर में छोटे मकान आवंटित हुए हैं, आधे लोगों को मकानों के लिए पांच साल का किरायानामा भरने की शर्त पर मकान दिए गए हैं। बाकी बचे 5 घरों में गंदे नाले के पास बसे हरिजन परिवारों में गुजर बसर कर रहे लोगों को अब भगवान का ही आसरा है।

गंदे नाले के पास होने से पहले ही उनके सामने कई तरह की समस्याएं हैं, ऊपर से पिछली साल जेडीए की ओर से हुए सर्वे में जब उन्हें छोड़ दिया गया तो उसके बाद से ही उनके चेहरों पर हवाइयां उड़ी हुई हैं। महेेश कुमार के दो बेटे हैं, वह अकेला रहता है, पता नहीं कब घर उजड़ जाए।

इसी बस्ती के खेमचंद व राजेश को भी यही चिंता खाए जा रही है कि उनका क्या होगा। बस्ती की एक महिला सोना के घर के बाहर भी कुछ टूटे फूटे बर्तन पड़े हैं, वह कहती है, मेरे दो छोटे छोटे बच्चे हैं, पति बमुश्किल कचरा बीनकर तीन चार हजार तक की जुगाड़ कर पाते हैं, ये कच्ची झोंपड़ी ही हमारा आसरा है, किन्तु क्या पता कब जयसिंहपुरा खोर में जाने का फरमान आ जाए।

कहती है- हमारा कचरा बीनने का काम यहीं है, पति का छोटा मोटा काम यहीं है अब जयसिंहपुरा खोर में जो मकान मिलेगा तो भी यहां आना ही पड़ेगा। ऐसे में तीन हजार तो आने जाने में ही खर्च हो जाएंगे, कैसे गुजारा करेंगे। यह पता नहीं।
हालांकि जेडीए ने यहां के लोगों को सौ से ज्यादा मकान छोटे मकान जयसिंहपुरा खोर में आवंटित किए हैं। बस्ती के कुछ लोग कहते हैं- जेडीए की ओर से मकान दिए जाने के बाद भी यहां से किसी का जाने का मन नहीं है। वे कहते हैं यह बस्ती नाले के पास बनी है किन्तु झालाना के पास बने वन विभाग के क्षेत्र से सटी है और वन विभाग कोर्ट में चल रहा केस जीत गया है इसलिए कच्ची झोंपडिय़ां और मकान खाली कराने की बात कही जा रही है। कुछ दिन पहले जेडीए के अधिकारी आए भी थे तभी से हमारी नींद उड़ी हुई है।

मालवीय नगर वाल्मीकि बस्ती के अध्यक्ष सुनील पटूना कहते हैं – बस्ती के गरीब लोग डरे हुए हैं, हमने दो बार जेडीए के अधिकारियों को ज्ञापन भी दिए हैं किन्तु अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

यहां जीवन यापन वैसे ही बहुत कठिन है, अच्छा होता जेडीए अधिकारियों ने मानवीयता के आधार पर सोचकर बस्ती से चार पांच किलोमीटर के क्षेत्र में मकान देने का फैसला किया होता, पर गरीबों की कौन सुनता है! हालात यह हैं कि कच्ची झोंपडिय़ों में रहकर गुजर बसर कर रहे कुछ लोगों के पास कागज नहीं है, ऐसे में उनके सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा हो गया है।


 

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